ज़माना

Posted in Poem on February 8, 2015 by sj

खुली सड़क पर रात के अँधेरे में
कमीज की बाहें मोड़ें, रबड़ की चप्पल पहन
रास्ते के छोटे पत्थर को ठोकर मार चलते
बेफिक्री का वो लम्हा ही कुछ और था

कुछ बेमतलब की बातें, वो ज़ोरों के ठहाके
सभी दोस्त और कुछ जो थे अपने
चुटकुले, संवाद और अनगिनत बातें
वो ज़िन्दगी के गाने का अंदाज़ ही कुछ और था

काले बादलों को निचोड़, रस सी टपकती
उन गीली बारिश की लहरों के बाद, सड़क के किनारे
आधे पके भुट्टे पर निम्बू-मसाला रगड़
आधा तोड़ तुमसे बाँट खाना अज़ीज़ था

अपनों की दुनिया में उन सपनो के साथ
तसवीरें सजाना और बातें बनाना
देर रात तक जागना और फिर तकिये से लड़ना
ज़िन्दगी संग हंसने का वो ज़माना ही कुछ और था ||

७ फरवरी २०१५

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‘गैजेट’

Posted in Poem on November 22, 2013 by sj

दो पल भी खाली बैठा नहीं जाता
हाथों में जैसे कुछ खुजली सी होती है
आँखें धुंधलाती सी है, पंजे पसीजते से
शारीर शिथिल हो कचोटता सा है

तपती गर्मी में बिजली के बिना
जैसे पसीने से बदन छटपटाता सा है,
ठीक वैसे ही इस पल बिना किसी ‘गैजेट’ के,
ये मस्तिस्क कुन्हरता – जुहँझलाता सा है

खाली हाथ एक के ऊपर एक धरे
पैर एड़ियों पर चढ़ाये बैठे
बूझता नहीं कुछ, इस खालीपन में
समय रुका हुआ सा, चुभता जाता है

अन्तः, गहरी सासों सहित बिना ज़यादा हिले-डुले
पतलून की जेब टटोल कुछ ठंडक सी मिली,
फट से फ़ोन उठा एक ‘गेम’ चालू किया
बेवजह ये मन घबराता क्यों है?

२१ नवंबर २०१३

घर से दूर

Posted in Poem on July 29, 2013 by sj
शाम को क्रिकेट खेल जब घर वापिस आया तो
बदन पसीने से भीग रहा था 
कमीज़ की उधड़ी सिलाई और खुल गयी थी 
जून की भीषण गर्मी से
ये बाहें कुछ झुलस सी गयी थीं
और ज़ोरों की प्यास लगी थी
कुछ ठंडा खाने की आस बड़ी थी
 
बाहर आइस-क्रीम वाले की गाड़ी की तभी घंटी बजी
बिना सोचे, मैं ज़ोर से चिल्लाया –
“माँ, आइस-क्रीम खानी है, कुछ पैसे दे दो”
किचन में एग्जॉस्ट-पंखे की खर्र-खर्र के बीच
माँ की ममता-भरी आवाज़ आई –
“पैसे फ्रिज पे हैं, पर ज्यादा ठंडा गरम मत करना”
और बस इतनी सरलता से समस्या हल हुई
की खुद क्यों चिंता लें, सोचें,
जब माँ है
 
अब खुद की कमाई है, घर में एक फ्रिज भी है,
बाहर आइस-क्रीम वाले की गाड़ी नहीं पर
फ्रिज खुद आइस-क्रीम से भरा हुआ है
लेकिन, न तो खाने की वही इच्छा है, न वही स्वाद
अब सिर्फ चिंता है, बेमतलब की सोच है
शरीर को कुरेदती एक गहमी से आग है
और हाथों में एक महंगा फ़ोन
जिसमे माँ का दस अंकों का नंबर है ॥
 
२९  जुलाई २०१३ 

कोहरा

Posted in Poem on February 27, 2012 by sj

सवेरे उठे हलके से पवन के झोंके ने
जब छुआ तो सनसना उठा बदन एकाके से,
एक महकी सी ठंडक लगी कुछ कहने
और कोहरे के धुएँ लगे छटने से,

यूँ ओस की बूँदें लगी जब गिरने
एक लकीर सी बन उठी आईने में,
मन लीन हुआ कुछ खोई हुई आकृतियों में
स्वप्न बन जो बीत गई सन्नाटे में,

बीते समय की खोयी हुई सी कुछ यादें
यूँ उमड़ पड़ी जैसे पवन झरोखे से,
उत्तेजित हो सिहर उठा तन
लगा रोम-रोम महकने से,

एक बेसुध अश्व की निरंकुश दौड़ को जैसे
थाम लिया हो पर्वत की ऊँचाई नें,
ले आई वापस एक चीख सच्चाई की
भटके मन को इस पिघलते कोहरे में ||

२२ अगस्त २००७

दुविधा

Posted in Poem on November 18, 2011 by sj
कभी कलम पकडे बैठा किया करते थे
यूँ ऐंठे कुछ अपने ही ख्यालों में
कब स्याही सूखी, कब ख्याल वो छूटे
हाथों में कलम को राख वो छूटी
और दिन निरंतर बदले लम्बे सालों में

अटपटा सा लगता है अब कुछ
इन उधड़े, बेमन ख्यालों का स्पर्श
कैसे पिरौउन इनको एक धागे में
कैसे रूप दूँ इनको मैं एक नया
सब कुछ भुला दिया बीते सालों में

ख्यालों से पूछता हूँ सकुचाता
वर्षों बाद आखिर वो चाहते क्या हैं
एक दीप की लौ जला अँधेरे में
मुझको भला यूँ फुसलाते क्या हैं
जब सब लुटा दिया इन सालों में

क्या अब लिखे भला कोई कविता
क्या बैठ चुने इन ख्यालों को कोई
जो न था कवी पहले ही कहीं
बस संजोहे कुछ बिखरे ख्यालों को
फिर क्यों दोष भला उन बीते सालों को ||

१८ नवम्बर २०११

क्या करें बतलाओ भईया?

Posted in Poem on June 24, 2011 by sj

बैठे हाथ पे हाथ धरे
अब बने कहाँ के बाबू
उम्र बढ़ती पल-पल है
पल-पल बढ़ता है रुपैया
क्या करें बतलाओ भईया?

स्कूल से निकल कॉलेज गए
भूले सब खेल खिलौना
बदली हँसी जो खिलती सी
बदला जीवन का रवैया
क्या करें बतलाओ भईया?

वो कहते चेहरा बदल गया
कहाँ गया वो यौवन सा
दस वर्ष बीते लम्बे से
बीत गया वो समय सुनेहरा
क्या करें बतलाओ भईया?

कहं कबीर सत्वाणी सुनलो
न माया मरे न मनवा
चलती अब गाड़ी ऐसे ही
बस घिसड़े हर एक पहिया
अब क्या करें बतलाओ भईया?

२४ जून २०११

साईकिल और थकान

Posted in Poem on May 7, 2011 by sj

पाँव थके हैं, भारी से
धूप बाहर बुलाये
बैठे मल-मल कुर्सी पे
थोड़ा हिला न जाए
 
कहाँ गए वो दिन
जब पहिये मीलों दौड़ाये
अस्सी की क्या पूछो
सौ भी कम पड़ जाए
 
आये यहाँ विदेश में
यारों दामन चटकाए
सोचा हसीन वादियों में
मीलों गायब हो जाएँ
 
आई ‘ध्वनी’ जीवन में
सपना पूरा हो जाए
पर थकान का क्या करें
जो अब हर पल आये
 
कभी निकलते अकेले में
दूर कहाँ तक जाएँ
हालत इतनी पतली अब
दो टुक खींचा न जाए
 
सब चलते दो पहियों पे
मुझको कोने में टरकाये
कहें कवी – छोड़ो भी अब
ये बचपना बीता जाए
 
घुटना बोले खूब घिसा
खूब रगड़ी रगडाये
अब बैठे तो मत हिलो
जंग निरंतर लगती जाए
 
पतली सीख की टाँगें सी
हड्डी बाहर दिखलाए
खुद का बोझ संभाले कोई
साँस ये चढ़ती जाए
 
क्या फिर चीरूँगा सड़कों को
क्या फिर से बात वो आये
देखूँ टकटकी लगा खिड़की से
बाहर धूप ये ढलती जाए ||

७ मई २०११

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