सवेरे उठे हलके से पवन के झोंके ने
जब छुआ तो सनसना उठा बदन एकाके से,
एक महकी सी ठंडक लगी कुछ कहने
और कोहरे के धुएँ लगे छटने से,
यूँ ओस की बूँदें लगी जब गिरने
एक लकीर सी बन उठी आईने में,
मन लीन हुआ कुछ खोई हुई आकृतियों में
स्वप्न बन जो बीत गई सन्नाटे में,
बीते समय की खोयी हुई सी कुछ यादें
यूँ उमड़ पड़ी जैसे पवन झरोखे से,
उत्तेजित हो सिहर उठा तन
लगा रोम-रोम महकने से,
एक बेसुध अश्व की निरंकुश दौड़ को जैसे
थाम लिया हो पर्वत की ऊँचाई नें,
ले आई वापस एक चीख सच्चाई की
भटके मन को इस पिघलते कोहरे में ||
२२ अगस्त २००७